
शिवकांत शर्मा। मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट में एक लाख से अधिक स्थानों के लिए 22 लाख से अधिक छात्र बैठते हैं। यह चीनी यूनिवर्सिटियों में प्रवेश दिलाने वाली गाओकाओ परीक्षा के बाद दुनिया की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा है। पेपर लीक होने और परीक्षा रद होने से छात्रों की की मेहनत और लाखों की कोचिंग पर पानी फिर जाता है। नीट जैसी लीक गाओकाओ में नहीं हो सकती, क्योंकि पेपर सेट करने वालों का संपर्क काटकर उन्हें परीक्षा शुरू होने तक गुप्त स्थानों पर रखा जाता है और पेपर कड़ी सुरक्षा के साथ सेना की गाड़ियों में परीक्षा केंद्रों तक भेजे जाते हैं।
हालांकि भारत में भी इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों में प्रवेश के लिए परीक्षाओं से लेकर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के बिना संपन्न होती हैं, परंतु नीट में इसकी शुरुआत से ही गड़बड़ियां होती रही है। सीबीएसई और नेट जैसी परीक्षाओं में तो पेपर लीक के अलावा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में भी गड़बड़ी के मामले सामने आए। गड़बड़ियां केंद्रीय परीक्षा एजेंसी एनटीए की परीक्षाओं में ही नहीं, बल्कि राज्य एजेंसियों की परीक्षाओं में भी हो रही हैं।
इसलिए प्रवेश और भर्तियों की प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सीमित होते स्थान और फैलते कदाचार को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक ऐसी रणनीति बनाने की आवश्यकता है, जो परीक्षाओं की विश्वसनीयता बहाल कर सके। प्रतियोगी परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए सुनिश्चित करना होगा कि पेपर सेट करने वाले सुयोग्य और सत्यनिष्ठा संपन्न हों। कोचिंग उद्योग के साथ उनका कोई संबंध न हो।
पेपर सेट होने के बाद से परीक्षा होने तक वे कड़ी निगरानी में रहें और पेपर बनने से लेकर वितरण तक का काम संघ लोक सेवा आयोग जैसी किसी विश्वसनीय एजेंसी के हाथों में रहे। इसके साथ ही अभ्यर्थियों के तथ्यात्मक ज्ञान की परख करने की जगह अब उनकी समाधान बुद्धि और मौलिक विचारशक्ति को अधिक परखने की जरूरत है। इससे एक तो इन परीक्षाओं पर कोचिंग उद्योग का शिकंजा ढीला पड़ेगा। दूसरे चयन ऐसे प्रत्याशियों का होगा, जो एआइ के तेज विकास के कारण रोजगारों के बदलते स्वरूप के साथ भी बड़ी आसानी से सामंजस्य बिठा सकेंगे।
एआई के बारे पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के साथ हुई बातचीत में एलन मस्क ने कहा था, “हमने इतिहास की सबसे विघटनकारी शक्ति पैदा कर ली है। ऐसा कोई काम नहीं बचेगा, जिसे यह न कर सके। अब हमें सोचना होगा कि हम क्या करना चाहते हैं?” अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि एआइ का असर दुनिया की करीब 40 प्रतिशत नौकरियों पर हो सकता है। सहायक, सचिव, सलाहकार, विश्लेषक, सर्वेक्षक, कोडर, डिजाइनर और अनुवादक जैसे काम एआइ से कराए जा सकेंगे। नए कौशल सीखने में तत्पर, समाधान बुद्धि रखने वाले, समीक्षात्मक चिंतन और रचनात्मक स्वभाव वाले लोगों की मांग बढ़ेगी।
भारत में हर साल लगभग एक करोड़ छात्र स्नातक बनते हैं, जिनमें 17 लाख से अधिक इंजीनियर, एमबीए और डाक्टर होते हैं। हालांकि व्यावसायिक और औद्योगिक कौशल नहीं होने के कारण चार में से केवल एक एमबीए, पांच में से एक इंजीनियर और हर दस में से एक स्नातक ही काम पर लगाने लायक होता है। यह ऐसा टाइम बम है, जो भारत का वरदान समझी जाने वाली युवा शक्ति को अभिशाप में बदल सकता है। इसे अभिशाप में बदलने से रोकने के लिए शिक्षा प्रणाली में उद्योगों और कारोबारों की मांग के हिसाब से आमूल और निरंतर सुधार करने की आवश्यकता है। 2020 से लागू हुई शिक्षा नीति में खेलकूद और बुनियादी कौशल को पाठ्यक्रमों में जोड़कर सुधार के कुछ प्रयास किए गए हैं। परीक्षा प्रणाली को भी तार्किकता और समझ आधारित बनाने की कोशिश की गई है, परंतु वह पर्याप्त नहीं है।
भारतीय शिक्षा श्रम के प्रति हीन भावना पैदा करती है। यही उसकी मूल समस्या है। वह छात्रों को रोजगार के लिए नहीं, बाबूशाही और अफसरशाही के लिए तैयार करती है। इसीलिए काम-धंधों के संदर्भ में पकौड़े या चाय बेचने वाले की मिसाल का भी मजाक उड़ाया जाता है। गांधी जी इसे समझते थे। इसलिए ‘नई तालीम’ में उन्होंने कौशल केंद्रित शिक्षा को अनिवार्य बताया था। वही शिक्षा प्रणाली एआइ की चुनौतियों का असली समाधान बन सकती है। इसका प्रमाण जर्मनी की शिक्षा प्रणाली में देखा जा सकता है, जहां किताबी शिक्षा के साथ-साथ कामकाजी और प्रायोगिक शिक्षा का अनूठा संगम है।
छात्रों के लिए सातवीं कक्षा से ही कई विकल्प खुल जाते हैं। मसलन वे उच्च अकादमिक संस्थानों के लिए तैयार करने वाले विशिष्ट माध्यमिक स्कूलों में जा सकते हैं, जहां प्रवेश के लिए परीक्षा देनी होती है या सामान्य माध्यमिक स्कूलों में जा सकते हैं, जहां किताबी के साथ-साथ कामकाजी शिक्षा के तमाम विकल्प होते हैं या फिर सीधे कामकाजी स्कूल में या फिर तकनीकी स्कूल में जा सकते हैं, जहां उन्हें रुचि और प्रतिभा के आधार पर विभिन्न काम-धंधों, पेशों और व्यवसायों की शिक्षा दी जाती है। इसे दोहरी शिक्षा प्रणाली कहा जाता है, क्योंकि यह किताबी शिक्षा को काम के प्रशिक्षण के साथ मिलाकर चलती है। कामकाजी प्रशिक्षण के लिए हर जिले के उद्योग-धंधों को स्कूलों के साथ जोड़ा गया है, जिससे स्नातकों को अधुनातन कौशल सीखने को मिलते हैं, जिनकी उद्योग-धंधों को जरूरत होती है।
छात्रों को काम सीखने के साथ-साथ उसका पैसा भी मिलता है और पढ़ाई के बाद काम मिलने की संभावना भी बढ़ती है। इस प्रणाली की सबसे अच्छी बात यह है कि छात्रों और समाज में भारत की तरह काम-धंधों के प्रति हीन भावना नहीं है। नाई या बढ़ई के पेशे का भी वही सम्मान है, जो फैशन डिजाइनर या दंत चिकित्सक का है। यही वजह है कि जर्मनी में बेरोजगारी की दर सबसे कम है। भारत को भी ऐसी ही शिक्षा प्रणाली की जरूरत है। दुर्भाग्य यह है कि शिक्षा सुधारों पर गंभीर चर्चा करने की जगह हमारी संसद में खाली शोर मचता है, जो देश की युवा पीढ़ी के मातम की तरह है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)





